राहुल का तर्क

देश के युवाओं को आज रोजगार की जरूरत है तथा रोजगार की तलाश कर रहे शिक्षित युवा किसी न किसी माध्यम से खुद को गलत लोगों के हाथों का शिकार बना रहे हैं। लेकिन संसद में किए गए हंगामे को यदि बेरोजगारी या महंगाई से जोड़ा जाए तो शायद यह पूरी तरह दुरुस्त नहीं कहा जा सकता।

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कांग्रेस के युवराज कहलाने वाले राहुल गांधी की राजनीतिक सोच के बारे में कई मामलों में विवाद हो सकता है। हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भी राहुल की सोच के बारे में अपने पिता के दर्शन से अपनी पुस्तक के जरिए प्रकाश डालने का प्रयास किया है। इस बीच राहुल गांधी ने युवाओं की टीम को एक साथ लेकर भारत को जोड़ने का जो सिलसिला शुरू किया था, उसकी सभी ने तारीफ की थी। लेकिन कभी-कभी अतिरेक में राहुल गांधी की जुबान कुछ ऐसे फिसलती है कि बाद में कांग्रेस को लेने के देने पड़ जाते हैं। कांग्रेस के थिंक टैंक को इस मामले में राहुल गांधी की राजनीतिक समझ के साथ ही उनके भाषणों पर भी कुछ हद तक नियंत्रण की कवायद करनी चाहिए।

ताजा मसले को ही लिया जा सकता है। संसद में कुछ शरारती लोगों द्वारा किये गए हंगामे (संसद पर हमला) पर राहुल की बात खुद ही विवाद पैदा कर रही है। यही वजह है कि ज्यादातर कांग्रेस के बड़े नेता इस बयान पर कुछ भी कहने से बचने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल राहुल गांधी का मानना है कि संसद में जो ताजा हमला (हंगामा) किया गया है, उसकी जड़ में महंगाई और बेरोजगारी है। कुछ हद तक राहुल गांधी की बात जायज भी है।

युवाओं को आज रोजगार की जरूरत

देश के युवाओं को आज रोजगार की जरूरत है तथा रोजगार की तलाश कर रहे शिक्षित युवा किसी न किसी माध्यम से खुद को गलत लोगों के हाथों का शिकार बना रहे हैं। लेकिन संसद में किए गए हंगामे को यदि बेरोजगारी या महंगाई से जोड़ा जाए तो शायद यह पूरी तरह दुरुस्त नहीं कहा जा सकता। इस कड़ी में सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का ही नाम लिया जा सकता है जिनके शासनकाल में गरीबी हटाओ का नारा दिया गया था। सरकारें बदलती चली गईं, गरीबी मगर नहीं जा सकी। बेरोजगारी की समस्या भी कोई नई नहीं है।

लोकतंत्र में अपनी मांगें रखने के कई तरीके हैं। इसके लिए तरह-तरह के आंदोलन होते रहे हैं। लेकिन आंदोलन करना और सीधे संसद में धावा बोलना दोनों अलग-अलग हैं। संसद पर धावा बोलने का मतलब कुछ और ही होता है, जिसे राहुल गांधी भी समझ रहे होंगे। यदि समस्याओं के समाधान की राह ऐसे ही तलाशी जाती रही तब तो अराजकता फैल सकती है।

राहुल गांधी की दलील

राहुल गांधी की दलील को ही सही मान लिया जाए तो सवाल उठेगा कि क्या ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में कुछ विद्रोहियों द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या को राहुल गांधी जायज ठहराएंगे। तमिल ईलम की मांग कर रहे श्रीलंका में तमिल समुदाय के लोगों के गुस्से से राजीव गांधी की जान देने की घटना को भी क्या सही कहा जाएगा। नहीं, कतई नहीं। इंदिराजी या राजीव गांधी की हत्या किसी भी कीमत पर सही नहीं थी। किसी को अगर तत्कालीन सरकारों के काम करने के तरीके नापसंद थे तो उसके विरोध के और भी लोकतांत्रिक विकल्प थे।

प्रशासनिक कार्यकलापों या सरकारी नीतियों का विरोध लोकतंत्र में जरूर किया जा सकता है लेकिन कुछ संवैधानिक दायरों को मानना जरूरी होता है। संसद पर किए गए ताजा हमले के पीछे बेशक बेरोजगारी या महंगाई की समस्या हो सकती है लेकिन इसके लिए देश की सर्वोच्च पीठ को खतरे में डालना सर्वथा अनुचित है। राहुल को अपनी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है।