किसी भी सरकार के लिए बेहद जरूरी होता है कि वह जनता की उम्मीदों पर खरी उतरे। किस हालत में उसे राज्य की भलाई के लिए क्या करना पड़ रहा है या बाजार की हालत कैसी है-इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता।
ऐसे में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पंचायत चुनाव से ठीक पहले वर्ष 2022-23 का जो बजट पेश किया है, उसमें उनकी सोच का पता चलता है। बजट के प्रावधानों से ही पता चलता है कि आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद मुख्यमंत्री ने विकास के रास्ते खोलने का साहस दिखाया है जिसमें आधारभूत संरचना के विकास के लिए ही 3500 करोड़ रुपये दिए हैं।
इसके अलावा राज्य से लगातार हो रहे मेधा पलायन को भी ध्यान में रखते हुए नए लोगों को काम से जोड़ने तथा कौशल विकास व स्वरोजगार के रास्ते खोलने का बजट में संकेत है।
दरअसल पिछले कई सालों से बंगाल सरकार लगातार यह कोशिश करती रही है कि किसी भी हालत में निवेश को बढ़ावा दिया जाए। इसके लिए बाकायदा देशी-विदेशी निवेशकों को कोलकाता के ट्रेड फेयर या वाणिज्य मेले में बुलाया जाता रहा है।
इसी कड़ी में राज्य के युवाओं को नए सिरे से रोजगार के साधन मुहैया कराने की दिशा में मौजूदा बजट ने संकेत दिया है। सच तो यह है कि ममता बनर्जी को 2011 में जब राज्य की सत्ता हासिल हुई थी, उस समय तक राज्य के कल-कारखानों की हालत खस्ता हो चुकी थी। ज्यादातर कारखाने या तो बंद हो चुके थे अथवा बीमार हालत में चल रहे थे।
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इस राज्य की सबसे बड़ी त्रासदी रही है ट्रेड यूनियनों का आतंक। ज्यादातर निवेशकों ने वामपंथी सरकार के जमाने में ही बंगाल से अपनी पूंजी को समेट लिया था। तब के लोगों की शिकायत थी कि ट्रेड यूनियनों के आतंक के कारण उन्हें कारोबार में घाटा होने लगा था।
कच्चे माल की समय पर आपूर्ति नहीं हो पाती थी तथा ऊर्जा क्षेत्र में भी तब राज्य काफी कमजोर हुआ करता था। यह सही है कि बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने राज्य के ऊर्जा संकट को दूर किया तथा लोडशेडिंग की समस्या लगभग समाप्त हुई।
किंतु तबतक काफी देर हो चुकी थी। खस्ताहाल सड़कें, मजदूर यूनियनों का हंगामा, कच्चे माल की कमी तथा ऊर्जा के संकट ने ज्यादातर निवेशकों को बंगाल से तब मुंह मोड़ने पर मजबूर कर दिया था।
2011 के बाद से ममता बनर्जी लगातार कोशिश करती रहीं कि किसी भी सूरत में निवेश को बढ़ावा दिया जाए। इसके नतीजे भी आए हैं। कुछ निवेशकों ने बंगाल में निवेश करने का मन बनाया है। लेकिन इतने निवेश से ही काम नहीं चलने वाला। पंचायत चुनाव से पहले राज्य सरकार को इस बात की चिंता है कि ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए रोजगार के साधन मुहैया कराए जाएं।
इसी दिशा में सोचकर फिलहाल बजट पेश किया गया है। जमीन और मकान के करों में भी दी गई छूट को भी विकास के नजरिये से ही देखा जाना चाहिए।
कुल मिलाकर ममता बनर्जी ने बजट के जरिए यह बताने की कोशिश की है कि केंद्र सरकार से अपने हक के पैसे नहीं मिलने के बावजूद राज्य सरकार नागरिकों के विकास से पीछे नहीं हटने वाली है। जाहिर तौर पर ममता के इस बजट में उनकी ममतामयी छवि दिख रही है जिसके नतीजे निश्चित रूप से सकारात्मक ही होंगे।